घेंघा रोग के लक्षण और उपचार Goiter ke side-effect

घेंघा रोग (goiter) आमतौर पर आयोडीन की कमी के कारण होता है। विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी व्यक्ति में थायराइड ग्रंथि बढ़ जाती है तो उसे गलगंड रोग कहा जाता है। अर्थात् गले की गाँठ बहुत दिनों से बढ़ गयी हो या पुरानी हो जाये तो उसे इस रोग नाम से जाना जाता है। इस रोग को गलगंड, गिल्हड़ इत्यादि नामों के रूप में भी जाना जाता है।

घेंघा का आयुर्वेदिक इलाज

यदि आप कुछ ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहाँ goiter एक सामान्य रोग है या आपके शरीर में घेंघा रोग के लक्षण दिखाई देते हैं तो आप सबसे पहले अपने भोजन से बंदगोभी को दूर रखें।

घेंघा रोग लक्षण :

अब में आपको इस रोग की पहचान कैसे की जाती है इसके बारे में कुछ बातें बताने जा रहा हूँ जिन्हें आपको सावधानीपूर्वक पढ़ते हुए हमेशा याद रखनी चाहिए। इसके लक्षण निम्न प्रकार के होते हैं –

  • गले में सूजन या बड़ी गाँठ जैसी दिखाई देती है। यह गाँठ इतनी बड़ी हो सकती है कि आपके चेहरे की सारी रूप रेखा बिगाड़ सकती है। तथा आसपास के अंगों पर अपना दवाब डाल सकती है।
  • यह थायराइड ग्रंथि के बढ़ जाने के कारण कुछ भी निगलते समय ऊपर नीचे होती रहती है।
  • गले पर हाथों से छूने से वह गांठ जैसी चीज मुलायम महसूस होती है जिसे दवाने या मसलने पर किसी तरह की कोई पीड़ा नहीं होती है।
  • थायराइड ग्रंथि कभी कभी कैल्सियम जमने की वजह से कठोर भी हो जाती है।
  • घेंघा रोग स्वसन प्रणाली पर दबाव डालकर स्वांस लेने की परेशानी बढ़ा सकता है अथवा घरघराहट की आवाज पैदा कर सकता है।
  • जब इस तरह का रोगी कुछ भी खाता पीता है तो निगलने में थोड़ा कष्ट महसूस होता है।
  • इस रोग में किसी किसी रोगी की आवाज बदल सकती है और चेहरे पर लालिमा प्रतीत हो सकती है।

घेंघा रोग के कारण :

यह रोग ज्यादातर आयोडीन की कमी के कारण उत्पन्न होता है या फिर थायरायड हार्मोन बनाने वाले एन्जाइमो की कमी के कारण होता है।

गर्भावस्था के दौरान आयोडीन की बहुत ज्यादा कमी होना भी शिशु और माँ को इस तरह का रोग उत्पन्न कर सकता है।loading…

आहार में आयोडीन की कमी के कारण घेंघा रोग छिटपुट रूप में अथवा स्थायी रूप से उत्पन्न हो जाता है। स्थायी घेंघा उत्तरी भारत में बहुत ज्यादा देखने को मिलता है। दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्र हिमालय की तलहटी में कश्मीर से लेकर बर्मा तक जैसे हिमाचल प्रदेश, उत्तरी बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल, सिक्किम, भूटान, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड इत्यादि जगहों पर सर्वाधिक देखने को मिलता है।

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घेंघा रोग के उपचार :

ध्यान रहे यदि इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को ज्यादा कंपकपी होती हो या फिर वह बहुत ज्यादा बैचैन होता हो और उसकी आँखें फूलकर मोटी हो जाएँ तो यह दूसरी प्रकार का विषैला गलगंड होता है। इसके इलाज के लिए डॉक्टर से परामर्श लेने की बहुत ज्यादा आवश्यकता होती है।

यदि सही मायने में देखा जाये तो इसका इलाज सिर्फ और सिर्फ अच्छे डॉक्टर के पास ही होता है क्योंकि यह कोई छोटी मोटी बीमारी नहीं है।

इसलिए इसका उपचार डॉक्टर द्वारा ही किया जा सकता है। किसी भी हालत में बढ़ी हुयी ग्रंथि को छोटा कर पाना मुश्किल है। ऐसी अवस्था में ग्रंथि को ऑपरेशन के द्वारा निकाल कर थायरोक्सिन द्वारा आजीवन प्रतिस्थापन चिकित्सा दी जानी चाहिए।

घेंगा (गलगंड) रोग के प्रकार ?

घेंगा (गलगंड) रोग दो प्रकार के होते है।

  • डिफ्यूज स्माल गोइटर :- इसमें पूरी थाइरोइड ग्रंथि सूज जाती है। स्पर्श करने पर एक समान महसूस होती है।
  • नोड्युलर गोइटर :- इसमें थाइरोइड ग्रंथि की गांठ के कुछ हिस्से सूज जाते हैं। स्पर्श करने पर ग्रंथि उभरी हुई महसूस होती है।

घेंगा (गलगंड) रोग के लक्षण क्या है ? (What are the Symptoms of Goiter in Hindi)

  • प्रत्येक व्यक्ति में गलगंड का आकार छोटा या बढ़ा होता है। अधिकतर मामलो में सूजन हो जाती है। किंतु इससे दर्द का अनुभव नहीं होता है।
  •  घेंगा (गलगंड) रोग कुछ मामलो में गंभीर लक्षण उत्पन्न कर सकते है।
  •  गले में कुछ फसा हुआ महसूस होना।
  • खांसी आना।
  •  गला बैठ जाना।
  • भोजन निगलने में परेशानी होना।
  • सांस लेने में कठिनाई होना।
  • यदि यह लक्षण होना शुरू हुए है। तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करे।

CONCLUSION आज हमने क्या सिखा

यदि आपको आज के हमारे इस पोस्ट घेंघा रोग के लक्षण और उपचार पढ़ने में कहीं पर भी कोई भी समस्या आई है या फिर आप हमें इस पोस्ट से संबंधित कोई भी सुझाव देना चाहते हैं तो आप हमें नीचे कमेंट करके जरूर बताएं। हम इसका जल्द से जल्द रिप्लाई देने की कोशिश करेंगे

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